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दो मिनट की देरी, खत्म हो गया एक सपना: परीक्षा नियमों पर उठे सवाल, ‘अनुशासन’ बनाम ‘संवेदनशीलता’ की बहस तेज

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बिहार में बोर्ड परीक्षाओं के दौरान सख्त नियमों को लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है, लेकिन मसौढ़ी की एक दर्दनाक घटना ने इस बहस को झकझोर देने वाला मोड़ दे दिया है। दसवीं की परीक्षा देने जा रही एक छात्रा को मात्र दो मिनट की देरी के कारण परीक्षा केंद्र में प्रवेश नहीं मिला और इससे आहत होकर उसने अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। इस घटना ने न केवल शिक्षा व्यवस्था बल्कि समाज, अभिभावकों और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला पटना जिले के मसौढ़ी क्षेत्र का है, जहां महाराजचक गांव की छात्रा कोमल कुमारी पूरे वर्ष की मेहनत के बाद मैट्रिक परीक्षा देने निकली थी। लेकिन परीक्षा केंद्र पहुंचने में मामूली देरी हो जाने के कारण उसे अंदर जाने की अनुमति नहीं दी गई, जबकि परीक्षा शुरू होने में अभी समय शेष था। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार छात्रा ने गेट पर मौजूद कर्मियों से काफी देर तक गुहार लगाई, लेकिन नियमों का हवाला देकर उसे लौटा दिया गया। बाद में उसका शव रेलवे ट्रैक के पास मिला, जिससे पूरे इलाके में शोक और आक्रोश फैल गया। यह परीक्षा बिहार विद्यालय परीक्षा समिति द्वारा आयोजित मैट्रिक परीक्षा का हिस्सा थी, जिसमें समय से आधा घंटा पहले केंद्र पहुंचना अनिवार्य नियम है। इसी नियम के कारण अक्सर परीक्षार्थियों को देर होने पर बाहर ही रोक दिया जाता है। हर वर्ष कई जिलों से ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं, जहां छात्र परीक्षा केंद्र के बाहर रोते, मिन्नतें करते या दीवार फांदने की कोशिश करते दिखाई देते हैं। इस घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या परीक्षा अनुशासन लागू करने का तरीका इतना कठोर होना चाहिए कि उससे बच्चों का मानसिक संतुलन टूट जाए। छात्रा के परिजनों का कहना है कि वह ट्रैफिक जाम के कारण देर से पहुंची थी और परिवार ने उसे समझाने की भी कोशिश की, लेकिन वह सदमे से उबर नहीं सकी। यह घटना अकेली नहीं है। हाल ही में भोजपुर में भी परीक्षा के दबाव के कारण एक छात्रा द्वारा आत्महत्या करने की घटना सामने आई थी, जिसने शिक्षा व्यवस्था में बढ़ते मानसिक तनाव को उजागर कर दिया। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि बोर्ड परीक्षा बच्चों के लिए केवल एक शैक्षणिक प्रक्रिया नहीं बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा और पारिवारिक उम्मीदों से जुड़ा दबाव बन चुकी है। ऐसे में मामूली असफलता या बाधा भी कई बार बच्चों को मानसिक रूप से तोड़ देती है। शिक्षाविदों का कहना है कि परीक्षा प्रणाली में अनुशासन जरूरी है, लेकिन उसमें मानवीय संवेदना की भी जगह होनी चाहिए। उनका सुझाव है कि परीक्षा केंद्र अधीक्षकों को सीमित विवेकाधिकार दिया जाए ताकि 1-2 मिनट की वास्तविक देरी के मामलों में परिस्थितियों को देखकर निर्णय लिया जा सके। अभिभावकों की भी राय बंटी हुई है। कुछ लोग नियमों में ढील को गलत मानते हैं, तो कई का कहना है कि जीवन से बढ़कर कोई नियम नहीं हो सकता। उनका तर्क है कि यदि ट्रैफिक या दूरी जैसी वास्तविक समस्याओं के कारण कोई छात्र थोड़ा देर से पहुंचता है, तो उसे परीक्षा से वंचित करना अन्यायपूर्ण है। विशेषज्ञों के अनुसार इस समस्या की जड़ केवल नियम नहीं बल्कि परीक्षा को लेकर समाज में बना अत्यधिक दबाव भी है। बच्चों में यह धारणा गहराई से बैठ चुकी है कि एक परीक्षा ही उनके पूरे भविष्य का निर्धारण कर देगी, जबकि वास्तविकता इससे अलग है। कई विकल्प, सप्लीमेंट्री परीक्षाएं और अन्य अवसर हमेशा उपलब्ध रहते हैं। यह घटना अब शिक्षा व्यवस्था में संतुलन की मांग को तेज कर रही है—एक ओर अनुशासन बनाए रखने की जरूरत और दूसरी ओर बच्चों की मानसिक सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी। फिलहाल यह सवाल पूरे समाज के सामने खड़ा है कि क्या परीक्षा का एक नियम इतना कठोर होना चाहिए कि वह किसी विद्यार्थी के जीवन से बड़ा बन जाए।

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